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Saturday, September 22, 2007

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति

केरि केहरि कपि कोल कुरंगा बिगतबैर बिचरहिं सब संगा
फिरत अहेर राम छबि देखी होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी
बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं देखि राम बनु सकल सिहाहीं
सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या मेकलसुता गोदावरि धन्या
सब सर सिंधु नदी नद नाना मंदाकिनि कर करहिं बखाना
उदय अस्त गिरि अरु कैलासू मंदर मेरु सकल सुरबासू
सैल हिमाचल आदिक जेते चित्रकूट जसु गावहिं तेते
बिंधि मुदित मन सुखु समाई श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी पाइ जनम फल होहिं बिसोकी
परसि चरन रज अचर सुखारी भए परम पद के अधिकारी
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन मंगलमय अति पावन पावन
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू
पय पयोधि तजि अवध बिहाई जहँ सिय लखनु रामु रहे आई


Wednesday, September 19, 2007

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर

बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई
जब ते आइ रहे रघुनायकु तब तें भयउ बनु मंगलदायकु
फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नानामंजु बलित बर बेलि बिताना
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए
गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर


Monday, September 17, 2007

अमर नाग किंनर दिसिपाला चित्रकूट आए तेहि काला

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत


अमर नाग किंनर दिसिपाला चित्रकूट आए तेहि काला
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू मुदित देव लहि लोचन लाहू
बरषि सुमन कह देव समाजू नाथ सनाथ भए हम आजू
करि बिनती दुख दुसह सुनाए हरषित निज निज सदन सिधाए
चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए
आवत देखि मुदित मुनिबृंदा कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा
मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं सुफल होन हित आसिष देहीं
सिय सौमित्र राम छबि देखहिं साधन सकल सफल करि लेखहिं

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद
करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद

Sunday, September 16, 2007

चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ

जाहि चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए बचन सप्रेम राम मन भाए
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक आश्रम कहउँ समय सुखदायक
चित्रकूट गिरि करहु निवासू तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू
सैलु सुहावन कानन चारू करि केहरि मृग बिहग बिहारू
नदी पुनीत पुरान बखानी अत्रिप्रिया निज तपबल आनी
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि जो सब पातक पोतक डाकिनि
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं करहिं जोग जप तप तन कसहीं
चलहु सफल श्रम सब कर करहू राम देहु गौरव गिरिबरहू
चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ
आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू
लखन दीख पय उतर करारा चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा
नदी पनच सर सम दम दाना सकल कलुष कलि साउज नाना
चित्रकूट जनु अचल अहेरी चुकइ घात मार मुठभेरी
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना चले सहित सुर थपति प्रधाना
कोल किरात बेष सब आए रचे परन तृन सदन सुहाए
बरनि जाहि मंजु दुइ साला एक ललित लघु एक बिसाला