Saturday, June 9, 2007

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत जनिअहिं प्रान

  दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान

Friday, June 8, 2007

बड़भागी बनु अवध अभागी

जौं केवल पितु आयसु ताता तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना तौं कानन सत अवध समाना
पितु बनदेव मातु बनदेवी खग मृग चरन सरोरुह सेवी

बड़भागी बनु अवध अभागी जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी
जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू

राम उठाइ मातु उर लाई कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई
समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।

Thursday, June 7, 2007

काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ

काह पावकु जारि सक का समुद्र समाइ
का करै अबला प्रबल केहि जग कालु खाइ

Sunday, June 3, 2007

आसुतोष तुम्ह अवढर दानी आरति हरहु दीन जनु जानी

परी राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ मरमु महीसु


सुनहु राम सबु कारन एहू राजहि तुम पर बहुत सनेहू
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू छाड़ि सकहिं तुम्हार सँकोचू
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु
सकहु आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु

गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह


सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी बिनती सुनहु सदासिव मोरी
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी आरति हरहु दीन जनु जानी
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु
बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु

Saturday, June 2, 2007

कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास



मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ देहु लेहु
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु

थाति राखि मागिहु काऊ बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू दुइ कै चारि मागि मकु लेहू
रघुकुल रीति सदा चलि आई प्रान जाहुँ बरु बचनु जाई
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का देहु एक बर भरतहि टीका
मागउँ दूसर बर कर जोरी पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी
तापस बेष बिसेषि उदासी चौदह बरिस रामु बनबासी


कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास

तेहि छन राम मध्य धनु तोरा भरे भुवन धुनि घोर कठोरा

कोउ बुझाइ कहइ गुर पाहीं बालक असि हठ भलि नाहीं

रावन बान छुआ नहिं चापा हारे सकल भूप करि दापा
सो धनु राजकुअँर कर देहीं बाल मराल कि मंदर लेहीं
भूप सयानप सकल सिरानी सखि बिधि गति कछु जाति जानी
बोली चतुर सखी मृदु बानी तेजवंत लघु गनिअ रानी
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा सोषेउ सुजसु सकल संसारा
रबि मंडल देखत लघु लागा उदयँ तासु तिभुवन तम भागा
तब रामहि बिलोकि बैदेही सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही
मनहीं मन मनाव अकुलानी होहु प्रसन्न महेस भवानी
करहु सफल आपनि सेवकाई करि हितु हरहु चाप गरुआई
गननायक बरदायक देवा आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा
बार बार बिनती सुनि मोरी करहु चाप गुरुता अति थोरी
देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर


प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल

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गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी प्रगट लाज निसा अवलोकी
लोचन जलु रह लोचन कोना जैसे परम कृपन कर सोना
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी धरि धीरजु प्रतीति उर आनी
तन मन बचन मोर पनु साचा रघुपति पद सरोज चितु राचा
तौ भगवानु सकल उर बासी करिहि मोहि रघुबर कै दासी
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू सो तेहि मिलइ कछु संदेहू
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना कृपानिधान राम सबु जाना
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें

रामु चहहिं संकर धनु तोरा होहु सजग सुनि आयसु मोरा
चाप सपीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए
सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई
सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा
संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई
राम बाहुबल सिंधु अपारू चहत पारु नहि कोउ कड़हारू
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा मुएँ करइ का सुधा तड़ागा
का बरषा सब कृषी सुखानें समय चुकें पुनि का पछितानें
अस जियँ जानि जानकी देखी प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें काहुँ लखा देख सबु ठाढ़ें
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा भरे भुवन धुनि घोर कठोरा