Wednesday, December 26, 2007

मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए रामघाट सब लोग नहाए

भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा
दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की
तुलसी समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह
धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा बचन किरन मुनि कमल बिकासा
तेहि कि मोह ममता निअराई यह सिय राम सनेह बड़ाई
बिषई साधक सिद्ध सयाने त्रिबिध जीव जग बेद बखाने
राम सनेह सरस मन जासू साधु सभाँ बड़ आदर तासू
सोह राम पेम बिनु ग्यानू करनधार बिनु जिमि जलजानू
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए रामघाट सब लोग नहाए

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु

जनक दूत तेहि अवसर आए मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे बेषु देखि भए निपट दुखारे

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु

रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु

गरइ गलानि कुटिल कैकेई काहि कहै केहि दूषनु देई
अस मन आनि मुदित नर नारी भयउ बहोरि रहब दिन चारी
एहि प्रकार गत बासर सोऊ प्रात नहान लाग सबु कोऊ
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी गनप गौरि तिपुरारि तमारी
रमा रमन पद बंदि बहोरी बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी
राजा रामु जानकी रानी आनँद अवधि अवध रजधानी

Monday, December 24, 2007

देव एक बिनती सुनि मोरी उचित होइ तस करब बहोरी


तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें करौं काह असमंजस जीकें
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी तनु परिहरेउ पेम पन लागी
तासु बचन मेटत मन सोचू तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु

सुर गन सहित सभय सुरराजू सोचहिं चाहत होन अकाजू
बनत उपाउ करत कछु नाहीं राम सरन सब गे मन माहीं
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं रघुपति भगत भगति बस अहहीं
सुधि करि अंबरीष दुरबासा भे सुर सुरपति निपट निरासा
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा नरहरि किए प्रगट प्रहलादा


सेवक हित साहिब सेवकाई करै सकल सुख लोभ बिहाई
स्वारथु नाथ फिरें सबही का किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका
यह स्वारथ परमारथ सारु सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु
देव एक बिनती सुनि मोरी उचित होइ तस करब बहोरी
तिलक समाजु साजि सबु आना करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई बहुरिअ सीय सहित रघुराई
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई करुना सागर कीजिअ सोई

Sunday, December 23, 2007

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ अपराधिहु पर कोह न काऊ

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ अपराधिहु पर कोह काऊ
मो पर कृपा सनेह बिसेषी खेलत खुनिस कबहूँ देखी
सिसुपन तेम परिहरेउँ संगू कबहुँ कीन्ह मोर मन भंगू
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही हारेहुँ खेल जितावहिं मोही


Saturday, December 22, 2007

अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान

अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान
जो फुर कहहु नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान

Friday, December 21, 2007

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच

निसि नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी भे पुनीत पातक तम तरनी

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी भे पुनीत पातक तम तरनी
जासु नाम पावक अघ तूला सुमिरत सकल सुमंगल मूला
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस तीरथ आवाहन सुरसरि जस
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते।बोले गुर सन राम पिरीते
नाथ लोग सब निपट दुखारी कंद मूल फल अंबु अहारी
सानुज भरतु सचिव सब माता देखि मोहि पल जिमि जुग जाता
सब समेत पुर धारिअ पाऊ आपु इहाँ अमरावति राऊ
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई उचित होइ तस करिअ गोसाँई
धर्म सेतु करुनायतन कस कहहु अस राम
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम