Monday, August 27, 2007

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी
जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी

राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर
अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे बिधि हरि संभु नचावनिहारे
तेउ जानहिं मरमु तुम्हारा औरु तुम्हहि को जाननिहारा
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन जानहिं भगत भगत उर चंदन
चिदानंदमय देह तुम्हारी बिगत बिकार जान अधिकारी
नर तनु धरेहु संत सुर काजा कहहु करहु जस प्राकृत राजा
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे
तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा जस काछिअ तस चाहिअ नाचा



Sunday, August 12, 2007

बालमीकि आश्रम प्रभु आए

तहँ बसि कंद मूल फल खाई प्रात नहाइ चले रघुराई
देखत बन सर सैल सुहाए बालमीकि आश्रम प्रभु आए
राम दीख मुनि बासु सुहावन सुंदर गिरि काननु जलु पावन
सरनि सरोज बिटप बन फूले गुंजत मंजु मधुप रस भूले
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं बिरहित बैर मुदित मन चरहीं

सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा
देखि राम छबि नयन जुड़ाने करि सनमानु आश्रमहिं आने
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए कंद मूल फल मधुर मगाए
सिय सौमित्रि राम फल खाए तब मुनि आश्रम दिए सुहाए
बालमीकि मन आनँदु भारी मंगल मूरति नयन निहारी
तब कर कमल जोरि रघुराई बोले बचन श्रवन सुखदाई
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी

तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे भए सुकृत सब सुफल हमारे
अब जहँ राउर आयसु होई मुनि उदबेगु पावै कोई
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं ते नरेस बिनु पावक दहहीं
मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला बासु करौ कछु काल कृपाला
सहज सरल सुनि रघुबर बानी साधु साधु बोले मुनि ग्यानी
कस कहहु अस रघुकुलकेतू तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू


Wednesday, August 1, 2007

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेँइँ कीन्ह

सुनत तीरवासी नर नारी धाए निज निज काज बिसारी
लखन राम सिय सुन्दरताई देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई
अति लालसा बसहिं मन माहीं नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई बनहि चले पितु आयसु पाई
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं
तेहि अवसर एक तापसु आवा तेजपुंज लघुबयस सुहावा
कवि अलखित गति बेषु बिरागी मन क्रम बचन राम अनुरागी

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा जाइ बखानि

राम सप्रेम पुलकि उर लावा परम रंक जनु पारसु पावा
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ मिलत धरे तन कह सबु कोऊ
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा
कीन्ह निषाद दंडवत तेही मिलेउ मुदित लखि राम सनेही
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेँइँ कीन्ह

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी
चले ससीय मुदित दोउ भाई रबितनुजा कइ करत बड़ाई
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता

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एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन