सकल काम प्रद तीरथराऊ बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू आरत काह न करइ कुकरमू
अस जियँ जानि सुजान सुदानी सफल करहिं जग जाचक बानी
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन
Wednesday, October 31, 2007
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन
Wednesday, October 24, 2007
Tuesday, October 23, 2007
राम राम कहि जे जमुहाहीं तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं
राम राम कहि जे जमुहाहीं
तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा
कुल समेत जगु पावन कीन्हा
करमनास जलु सुरसरि परई
करमनास जलु सुरसरि परई
तेहि को कहहु सीस नहिं धरई
उलटा नामु जपत जगु जाना
उलटा नामु जपत जगु जाना
बालमीकि भए ब्रह्म समाना
Sunday, October 14, 2007
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग
Thursday, October 11, 2007
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ
Wednesday, October 10, 2007
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ
Saturday, October 6, 2007
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ
Thursday, October 4, 2007
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम
Wednesday, October 3, 2007
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम
प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती भइ जुग सरिस सिराति न राती
तापस अंध साप सुधि आई
भयउ बिकल बरनत इतिहासा
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती भइ जुग सरिस सिराति न राती
तापस अंध साप सुधि आई
कौसल्यहि सब कथा सुनाई
भयउ बिकल बरनत इतिहासा
राम रहित धिग जीवन आसा
सो तनु राखि करब मैं काहा जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा
हा रघुनंदन प्रान पिरीते तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते
हा जानकी लखन हा रघुबर हा पितु हित चित चातक जलधर
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम
सो तनु राखि करब मैं काहा जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा
हा रघुनंदन प्रान पिरीते तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते
हा जानकी लखन हा रघुबर हा पितु हित चित चातक जलधर
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम
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