Monday, April 28, 2008

आए देव सदा स्वारथी बचन कहहिं जनु परमारथी दीन बंधु दयाल रघुराया देव कीन्हि देवन्ह पर दाया

आए देव सदा स्वारथी बचन कहहिं जनु परमारथी
दीन बंधु दयाल रघुराया देव कीन्हि देवन्ह पर दाया

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत


सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत


Sunday, April 27, 2008

काल बिबस पति कहा न माना अग जग नाथु मनुज करि जाना

खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस
सायक एक नाभि सर सोषा अपर लगे भुज सिर करि रोषा
लै सिर बाहु चले नाराचा सिर भुज हीन रुंड महि नाचा
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा
गर्जेउ मरत घोर रव भारी कहाँ रामु रन हतौं पचारी
डोली भूमि गिरत दसकंधर छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई चापि भालु मर्कट समुदाई
मंदोदरि आगें भुज सीसा धरि सर चले जहाँ जगदीसा

पति सिर देखत मंदोदरी मुरुछित बिकल धरनि खसि परी

जुबति बृंद रोवत उठि धाईं तेहि उठाइ रावन पहिं आई

पति गति देखि ते करहिं पुकारा 

छूटे कच नहिं बपुष सँभारा

उर ताड़ना करहिं बिधि नाना 

रोवत करहिं प्रताप बखाना

तव बल नाथ डोल नित धरनी 

तेज हीन पावक ससि तरनी

सेष कमठ सहि सकहिं न भारा 

सो तनु भूमि परेउ भरि छारा

बरुन कुबेर सुरेस समीरा 

रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा

भुजबल जितेहु काल जम साईं 

आजु परेहु अनाथ की नाईं

जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई 

सुत परिजन बल बरनि न जाई

राम बिमुख अस हाल तुम्हारा 

रहा न कोउ कुल रोवनिहारा

काल बिबस पति कहा माना 
अग जग नाथु मनुज करि जाना

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं

जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं

आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं

तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं

अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन

जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान



Saturday, April 26, 2008

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदांतवेद्यं विभुम्
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान
कनक कोटि बिचित्र मणि कृत सुंदरायतना घना
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहुबिधि बना
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
तूल न ताहि सकल मिल जो सुख लेवे सत्संग
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु
सुनु मात साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज
सुन सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल
तव प्रभावँ वड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे
मन हरष सब गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम
जब लगि भजन न राम कहुँ सोक धाम तजि काम
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड
जो संपति सिव रावनहि दीन्ह दिएँ दस माथ
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ
जेहि बिधि उतरैं कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गाउअऊ
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान

Wednesday, April 23, 2008

गिरि कंदराँ सुनी संपाती

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं बी अवधि काज कछु नाहीं
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता
कह अंगद लोचन भरि बारी दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी
इहाँ सुधि सीता कै पाई उहाँ गएँ मारिहि कपिराई
पिता बधे पर मारत मोही राखा राम निहोर ओही
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं मरन भयउ कछु संसय नाहीं
अंगद बचन सुनत कपि बीरा बोलि सकहिं नयन बह नीरा
छन एक सोच मगन होइ रहे पुनि अस वचन कहत सब भए
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना
अस कहि लवन सिंधु तट जाई बैठे कपि सब दर्भ डसाई

जामवंत अंगद दुख देखी 
कहिं कथा उपदेस बिसेषी

तात राम कहुँ नर जनि मानहु निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि


एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती
बाहेर होइ देखि बहु कीसा मोहि अहार दीन्ह जगदीसा

आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ

कबहुँ मिल भरि उदर अहारा आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा

डरपे गीध बचन सुनि काना अब भा मरन सत्य हम जाना
कपि सब उठे गीध कहँ देखी जामवंत मन सोच बिसेषी
कह अंगद बिचारि मन माहीं धन्य जटायू सम कोउ नाहीं
राम काज कारन तनु त्यागी  हरि पुर गयउ परम बड़ भागी
सुनि खग हरष सोक जुत बानी  आवा निकट कपिन्ह भय मानी
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई
सुनि संपाति बंधु कै करनी रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी

मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि
बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि

अनुज क्रिया करि सागर तीरा कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा


हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई  गगन गए रबि निकट उडाई
तेज सहि सक सो फिरि आवा  मै अभिमानी रबि निअरावा
जरे पंख अति तेज अपारा  परेउँ भूमि करि घोर चिकारा

मुनि एक नाम चंद्रमा ओही 
लागी दया देखी करि मोही
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा  
देहि जनित अभिमानी छड़ावा

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही तासु नारि निसिचर पति हरिही
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता

जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता  तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता

मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू  सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू


गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका  तहँ रह रावन सहज असंका

तहँ असोक उपबन जहँ रहई  सीता बैठि सोच रत अहई

मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार

बूढ भयउँ करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार

जो नाघइ सत जोजन सागर  करइ सो राम काज मति आगर
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा  राम कृपाँ कस भयउ सरीरा

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं 
अति अपार भवसागर तरहीं
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई 
राम हृदयँ धरि करहु उपाई

अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ
निज निज बल सब काहूँ भाषा पार जाइ कर संसय राखा

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा

जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी
बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि जाई
उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा जियँ संसय कछु फिरती बारा

जामवंत कह तुम्ह सब लायक पठइअ किमि सब ही कर नायक

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना का चुप साधि रहेहु बलवाना

पवन तनय बल पवन समाना 
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना
कवन सो काज कठिन जग माहीं 
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं
राम काज लगि तब अवतारा 
सुनतहिं भयउ पर्वताकारा

कनक बरन तन तेज बिराजा मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा
सिंहनाद करि बारहिं बारा लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा

सहित सहाय रावनहि मारी आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी

जामवंत मैं पूँछउँ तोही 
उचित सिखावनु दीजहु मोही

एतना करहु तात तुम्ह जाई सीतहि देखि कहहु सुधि आई
तब निज भुज बल राजिव नैना कौतुक लागि संग कपि सेना
कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं