Saturday, February 16, 2008

पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा

 


पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा पंपा नाम सुभग गंभीरा
संत हृदय जस निर्मल बारी बाँधे घाट मनोहर चारी
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा जनु उदार गृह जाचक भीरा

पुरइनि सबन ओट जल बेगि पाइअ मर्म
मायाछन्न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म


सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं


बिकसे सरसिज नाना रंगा मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा
चक्रवाक बक खग समुदाई देखत बनइ बरनि नहिं जाई
सुन्दर खग गन गिरा सुहाई जात पथिक जनु लेत बोलाई
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए चहु दिसि कानन बिटप सुहाए
चंपक बकुल कदंब तमाला पाटल पनस परास रसाला
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना चंचरीक पटली कर गाना
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ संतत बहइ मनोहर बाऊ
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ

देखि राम अति रुचिर तलावा मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा
देखी सुंदर तरुबर छाया बैठे अनुज सहित रघुराया

तहँ पुनि सकल देव मुनि आए अस्तुति करि निज धाम सिधाए

Wednesday, February 13, 2008

राखिअ नारि जदपि उर माहीं जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं

चले राम त्यागा बन सोऊ अतुलित बल नर केहरि दोऊ
बिरही इव प्रभु करत बिषादा कहत कथा अनेक संबादा
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा देखत केहि कर मन नहिं छोभा
नारि सहित सब खग मृग बृंदा मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा
हमहि देखि मृग निकर पराहीं मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए कंचन मृग खोजन आए
संग लाइ करिनीं करि लेहीं मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं


सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ

राखिअ नारि जदपि उर माहीं जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं

देखहु तात बसंत सुहावा प्रिया हीन मोहि भय उपजावा
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात

बिटप बिसाल लता अरुझानी बिबिध बितान दिए जनु तानी
कदलि ताल बर धुजा पताका दैखि मोह धीर मन जाका
बिबिध भाँति फूले तरु नाना जनु बानैत बने बहु बाना
कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए जनु भट बिलग बिलग होइ छाए
कूजत पिक मानहुँ गज माते ढेक महोख ऊँट बिसराते
मोर चकोर कीर बर बाजी पारावत मराल सब ताजी
तीतिर लावक पदचर जूथा बरनि जाइ मनोज बरुथा
रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना चातक बंदी गुन गन बरना
मधुकर मुखर भेरि सहनाई त्रिबिध बयारि बसीठीं आई
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें
लछिमन देखत काम अनीका रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका
एहि कें एक परम बल नारी तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि


गुनातीत सचराचर स्वामी राम उमा सब अंतरजामी
कामिन्ह कै दीनता देखाई धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई
क्रोध मनोज लोभ मद माया छूटहिं सकल राम कीं दाया
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला जा पर होइ सो नट अनुकूला


उमा कहउँ मैं अनुभव अपना 
सत हरि भजनु जगत सब सपना