Saturday, June 28, 2008
छहूँ रितु
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू
बरनब राम बिबाह समाजू सो मुद मंगलमय रितुराजू
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू पंथकथा खर आतप पवनू
बरषा घोर निसाचर रारी सुरकुल सालि सुमंगलकारी
राम राज सुख बिनय बड़ाई बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई
सती सिरोमनि सिय गुनगाथा सोइ गुन अमल अनूपम पाथा
भरत सुभाउ सुसीतलताई सदा एकरस बरनि न जाई
Friday, June 27, 2008
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा तिन्हहि राम पद अति अनुरागा
तापस सम दम दया निधाना परमारथ पथ परम सुजाना
माघ मकरगत रबि जब होई तीरथपतिहिं आव सब कोई
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनींपूजहि माधव पद जलजाता परसि अखय बटु हरषहिं गाता
भरद्वाज आश्रम अति पावन परम रम्य मुनिबर मन भावन
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा जाहिं जे मज्जन तीरथराजा
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा कहहिं परसपर हरि गुन गाहा
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं
प्रति संबत अति होइ अनंदा मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा
एक बार भरि मकर नहाए सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए
जागबलिक मुनि परम बिबेकी भरव्दाज राखे पद टेकी
सादर चरन सरोज पखारे अति पुनीत आसन बैठारे
करि पूजा मुनि सुजस बखानी बोले अति पुनीत मृदु बानी
नाथ एक संसउ बड़ मोरें करगत बेदतत्त्व सबु तोरें
कहत सो मोहि लागत भय लाजा जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू हरहु नाथ करि जन पर छोहू
राम नाम कर अमित प्रभावा संत पुरान उपनिषद गावा
संतत जपत संभु अबिनासी सिव भगवान ग्यान गुन रासी
आकर चारि जीव जग अहहीं कासीं मरत परम पद लहहीं
सोपि राम महिमा मुनिराया सिव उपदेसु करत करि दाय
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही
एक राम अवधेस कुमारा तिन्ह कर चरित बिदित संसारा
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा भयहु रोषु रन रावनु मारा
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचार
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी
जागबलिक बोले मुसुकाई तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई
राममगत तुम्ह मन क्रम बानी चतुराई तुम्हारि मैं जान
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा
तात सुनहु सादर मनु लाई कहउँ राम कै कथा सुहाई
प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान
प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल
पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल
जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान
जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान
सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस
एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ
एक सूल मोहि बिसर न काऊ गुर कर कोमल सील सुभाऊ
चरम देह द्विज कै मैं पाई सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई
खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला करउँ सकल रघुनायक लीला
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा
मन ते सकल बासना भागी केवल राम चरन लय लागी
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी
प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई
भए कालबस जब पितु माता मैं बन गयउँ भजन जनत्राता
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ
बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा
सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा अब्याहत गति संभु प्रसादा
छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी एक लालसा उर अति बाढ़ी
राम चरन बारिज जब देखौं तब निज जन्म सफल करि लेखौं
जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई ईस्वर सर्ब भूतमय अहई
निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई
गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग
रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग
मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन
देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन
सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज
मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज
तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान
सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा कहे कछुक सादर खगनाथा
ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि मोहि परम अधिकारी जानी
लागे करन ब्रह्म उपदेसा अज अद्वेत अगुन हृदयेसा
अकल अनीह अनाम अरुपा अनुभव गम्य अखंड अनूपा
मन गोतीत अमल अबिनासी निर्बिकार निरवधि सुख रासी
सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा बारि बीचि इव गावहि बेदा
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा सगुन उपासन कहहु मुनीसा
राम भगति जल मम मन मीना किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना
सोइ उपदेस कहहु करि दाया निज नयनन्हि देखौं रघुराया
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा
मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा खंडि सगुन मत अगुन निरूपा
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी
उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा मुनि तन भए क्रोध के चीन्ह
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ
अति संघरषन जौं कर कोई अनल प्रगट चंदन ते होई
बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान
मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान
क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान
मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें
परद्रोही की होहिं निसंका कामी पुनि कि रहहिं अकलंका
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें
काहू सुमति कि खल सँग जामी सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें
पावन जस कि पुन्य बिनु होई बिनु अघ अजस कि पावइ कोई
लाभु कि किछु हरि भगति समाना जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना
हानि कि जग एहि सम किछु भाई भजिअ न रामहि नर तनु पाई
अघ कि पिसुनता सम कछु आना धर्म कि दया सरिस हरिजाना
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि
सत्य बचन बिस्वास न करही बायस इव सबही ते डरही
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला सपदि होहि पच्छी चंडाला
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई नहिं कछु भय न दीनता आई
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी लीन्हि प्रेम परिच्छा मोर
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना मुनि मति पुनि फेरी भगवाना
रिषि मम महत सीलता देखी राम चरन बिस्वास बिसेषी
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई
सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई
मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा हरषित राममंत्र तब दीन्हा
बालकरूप राम कर ध्याना कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना
सुंदर सुखद मिहि अति भावा सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा रामचरितमानस तब भाषा
सादर मोहि यह कथा सुनाई पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई
रामचरित सर गुप्त सुहावा संभु प्रसाद तात मैं पावा
तोहि निज भगत राम कर जानी ताते मैं सब कहेउँ बखानी
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं
मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा
निज कर कमल परसि मम सीसा हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा
राम भगति अबिरल उर तोरें।बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें
सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान
कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान
जेंहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत
ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ
राम रहस्य ललित बिधि नाना गुप्त प्रगट इतिहास पुराना
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ नित नव नेह राम पद होऊ
जो इच्छा करिहहु मन माहींहरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा
एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी यह मम भगत कर्म मन बानी
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ प्रेम मगन सब संसय गयऊ
करि बिनती मुनि आयसु पाई पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा बीते कलप सात अरु बीसा
करउँ सदा रघुपति गुन गाना सादर सुनहिं बिहंग सुजाना
जब जब अवधपुरीं रघुबीरा धरहिं भगत हित मनुज सरीरा
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ
पुनि उर राखि राम सिसुरूपा निज आश्रम आवउँ खगभूपा
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई काग देह जेहिं कारन पाई
कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी राम भगति महिमा अति भारी
ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह
निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह
भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप
मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न